गीता शिक्षा
भगवद गीता के शाश्वत ज्ञान को अपने जीवन में अपनाएं।
आध्यात्मिक मार्गदर्शन
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समाज सेवा
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भगवान श्री कृष्ण के अलौकिक कार्य और उनका वैश्विक संदेश
भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण अवतार ही इस पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ था। जब-जब समाज में नैतिक मूल्यों का पतन हुआ और क्रूर शक्तियों का अत्याचार बढ़ा, तब-तब उन्होंने कंस, शिशुपाल और जरासंध जैसे अधर्मी तत्वों का अंत करके न्याय की स्थापना की। उनका जीवन हमें सिखाता है कि न्याय के मार्ग पर चलते समय कभी भी भयभीत नहीं होना चाहिए। उन्होंने समाज के शोषित और पीड़ित वर्ग को हमेशा संरक्षण दिया और यह सिद्ध किया कि संसार की सबसे बड़ी शक्ति केवल और केवल सत्य और धर्म के पक्ष में ही खड़ी होती है।
महाभारत के युद्ध की विभीषिका के बीच, जब अर्जुन अपने मार्ग से भटक गए और मोहग्रस्त हो गए, तब श्री कृष्ण ने उन्हें निमित्त बनाकर संपूर्ण मानवता को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया। गीता का यह उपदेश केवल किसी एक युग या युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व का समाधान है। भगवान ने इसमें ज्ञान, भक्ति और कर्म का ऐसा अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है जो आज भी आधुनिक जीवन के तनाव, अवसाद और उलझनों से निकलने का एकमात्र अचूक मार्ग है।
श्री कृष्ण के कार्यों का सबसे व्यावहारिक और शक्तिशाली पहलू उनका ‘निष्काम कर्मयोग’ का सिद्धांत है। उन्होंने संसार को सिखाया कि “कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसके फलों पर नहीं।” इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को अपनी पूरी क्षमता और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, बिना इस चिंता के कि उसका परिणाम क्या होगा। जब हम फल की चिंता छोड़ कर कर्म करते हैं, तो हमारा मन शांत और केंद्रित रहता है। वेबसाइट के माध्यम से आज के युवाओं को इस सिद्धांत से जोड़ना बेहद जरूरी है ताकि वे असफलताओं से डरे बिना निरंतर आगे बढ़ सकें।
भगवान श्री कृष्ण का चरित्र एक महान समाज सुधारक का भी है। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। जहाँ एक ओर उन्होंने राजाओं के आमंत्रण को छोड़कर विदुर जी के घर जाकर प्रेम से साग खाया, वहीं दूसरी ओर सुदामा जैसे निर्धन मित्र को गले लगाकर समाज को सच्ची मित्रता और समरसता का पाठ पढ़ाया। उनका जीवन गो-सेवा, प्रकृति संरक्षण (गोवर्धन पूजा) और समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान के प्रति समर्पित था। यही समरसता और नि:स्वार्थ सेवा का भाव ‘विश्व गीता संस्थान’ का भी मुख्य आधार है।
विश्व गीता संस्थान – ज्ञान और धर्म का दिव्य मार्ग
विश्व गीता संस्थान की स्थापना 16 मई 2021 को माननीय आचार्य राधाकृष्ण मनोड़ी जी (संस्थापक एवं विश्व हिंदू परिषद केंद्रीय मंत्री) के कर-कमलों द्वारा की गई। यह संस्थान श्री कृष्ण के दिव्य संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के पावन उद्देश्य से समर्पित है। संस्थान का ध्येय केवल एक संगठन का निर्माण नहीं, बल्कि श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत ज्ञान—धर्मरक्षा, न्यायबोध और कर्मयोग—को राष्ट्र और समाज के कण-कण तक पहुँचाना है।
संस्थान सनातन मूल्यों की रक्षा, ऐतिहासिक भ्रांतियों के निराकरण, तथा समाज में व्याप्त वैमनस्य और अज्ञानता के उन्मूलन हेतु निरंतर कार्य कर रहा है। इसका मुख्य लक्ष्य एक जागरूक, संगठित और धर्मनिष्ठ समाज की स्थापना करना है। विश्व गीता संस्थान केवल एक संस्था नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आत्मा से जुड़ा हुआ एक वैश्विक अभियान है।
यह संस्थान समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भगवान श्री कृष्ण के जीवन, दर्शन और संदेश से जोड़ने का कार्य कर रहा है। संस्थान का प्रयास है कि प्रत्येक परिवार, प्रत्येक युवा और प्रत्येक साधक के जीवन में धर्मबोध, न्यायभाव और राष्ट्रचेतना जाग्रत हो। शोध, प्रवचन, अध्ययन और सेवा—ये संस्थान के वे माध्यम हैं जिनके द्वारा सनातन परंपरा को आधुनिक युग में पुनः प्रतिष्ठित किया जा रहा है। विश्व गीता संस्थान दृढ़ संकल्प के साथ यह उद्घोष करता है कि जब तक धर्म सुरक्षित है, तभी समाज, संस्कृति और राष्ट्र सुरक्षित रहेंगे।
भगवान श्री कृष्ण का संदेश
- निष्काम कर्मयोग का पालन व फल की चिंता का त्याग
- वेदोक्त धर्मानुसार जीवनचर्या
- अहंकार का परित्याग व प्रभु-शरणागति
- समस्त जीवों पर दया व समभाव
- धर्म की रक्षा व पुनर्स्थापना के लिए तत्परता
- आध्यात्मिक ज्ञान व भक्ति का प्रसार
- परमात्मा व दिव्य प्रेम में अटूट श्रद्धा
- विश्व के कल्याण व मंगल की कामना
युवा प्रतिभा विकास मंच (विश्व गीता संस्थान की एक पहल)
विश्व गीता संस्थान के एक गौरवशाली प्रकल्प के रूप में ‘युवा प्रतिभा विकास मंच’ की स्थापना की गई है। यह मंच युवाओं के भीतर छिपी असीम ऊर्जा और प्रतिभा को पहचान कर उसे सही और सकारात्मक दिशा देने का एक राष्ट्रीय प्रयास है। हमारा मुख्य उद्देश्य आज की युवा पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा और कौशल के साथ-साथ श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत संस्कारों और ‘निष्काम कर्मयोग’ से जोड़ना है, ताकि वे जीवन की हर चुनौती का डटकर सामना कर सकें।
यह मंच युवाओं को केवल एक सफल व्यक्ति नहीं, बल्कि एक चरित्रवान और राष्ट्रभक्त लीडर (नेतृत्वकर्ता) बनाने के लिए पूरी तरह समर्पित है। इसके अंतर्गत युवाओं के लिए कौशल संवर्धन, कला, संस्कृति और बौद्धिक विकास के विभिन्न प्रेरणादायक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हम देश के हर उस युवा का आह्वान करते हैं जो अपनी योग्यताओं को निखार कर एक सशक्त समाज और महान राष्ट्र के निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान देना चाहता है।
विश्व गीता संस्थान के 10 नियम
विश्व गीता संस्थान निरंतर भगवान श्री कृष्ण के आदर्शों, सनातन संस्कृति और गीता के शाश्वत ज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार के लिए समाज को संगठित करने और आने वाली पीढ़ियों तक इस गौरवशाली विरासत को पहुँचाने के लिए समर्पित होकर कार्य कर रहा है।
नियमित गीता स्वाध्याय
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक पवित्र ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन की हर समस्या का समाधान और जीवन जीने की सर्वोच्च कला है। विश्व गीता संस्थान के प्रत्येक सदस्य और अनुयायी के लिए यह अनिवार्य है कि वह प्रतिदिन गीता के कम से कम एक श्लोक का पूरे भक्तिभाव से पाठ करे। केवल पाठ करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके गूढ़ अर्थों पर गहराई से मनन करना और उन शिक्षाओं को अपने आधुनिक जीवन, परिवार और कार्यक्षेत्र में उतारना हमारा मुख्य लक्ष्य है। स्वाध्याय से ही हमारी आत्मा का शुद्धिकरण होता है और हमें सही निर्णय लेने की आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
निष्काम कर्मयोग का पालन
भगवान श्री कृष्ण का सबसे महान उपदेश ‘कर्मयोग’ है। संस्थान का यह नियम हमें सिखाता है कि हम अपने दैनिक जीवन, व्यापार, नौकरी या सेवा में जो भी कर्म करें, वह पूरी ईमानदारी, समर्पण और अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के साथ करें। परंतु, उस कर्म के फल (Result) के प्रति किसी भी प्रकार की आसक्ति या मोह न रखें। जब मनुष्य फल की चिंता से मुक्त होकर केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसका तनाव समाप्त हो जाता है और उसके कार्य में दिव्यता आ जाती है। यही निष्काम कर्मयोग समाज के विकास और हमारी व्यक्तिगत शांति का सबसे बड़ा आधार है।
सत्य और धर्म का आचरण
सत्य और धर्म सनातन संस्कृति के दो सबसे मजबूत स्तंभ हैं। संस्थान का प्रत्येक सदस्य अपने विचारों, शब्दों और कार्यों में पूर्ण रूप से सत्य का पालन करने का संकल्प लेता है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें कभी भी धर्म (सही और न्यायपूर्ण मार्ग) का साथ नहीं छोड़ना है। भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में यही सिखाया था कि अन्याय के सामने झुकना भी उतना ही बड़ा पाप है जितना अन्याय करना। इसलिए, अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में धर्म के सिद्धांतों को अपनाना हमारा परम दायित्व है।
गो-सेवा और प्रकृति संरक्षण
भगवान श्री कृष्ण को ‘गोपाल’ कहा जाता है क्योंकि उनका गोमाता और प्रकृति से अटूट प्रेम था। गोवर्धन पर्वत की पूजा करके उन्होंने संपूर्ण विश्व को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था। इसी आदर्श पर चलते हुए, संस्थान का यह नियम हमें गोवंश की रक्षा, उनकी नि:स्वार्थ सेवा और उनके संवर्धन के प्रति प्रेरित करता है। इसके साथ ही, वृक्षारोपण करना, जल का संरक्षण करना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव रखना हमारे आध्यात्मिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है। प्रकृति की रक्षा करना ही वास्तव में ईश्वर की सच्ची आराधना है।
सामाजिक समरसता और समानता
सनातन धर्म ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) के सिद्धांत पर आधारित है। गीता के अनुसार, एक सच्चा ज्ञानी वही है जो सभी प्राणियों में उसी एक परमात्मा के दर्शन करता है (समदर्शी)। संस्थान का यह नियम समाज में व्याप्त जाति, पाति, ऊंच-नीच, और अमीर-गरीब के हर प्रकार के भेदभाव को जड़ से मिटाने का आह्वान करता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसे संगठित समाज का निर्माण करना है जहाँ हर व्यक्ति दूसरे का सम्मान करे, समाज में भाईचारा हो, और सभी मिलकर एक सशक्त और समरस राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दें।
व्यसन मुक्ति और सात्विक जीवन
शारीरिक और मानसिक शुद्धता के बिना आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है। संस्थान का यह नियम हमें हर प्रकार के व्यसन (नशे), जुए और समाज को खोखला करने वाली बुरी आदतों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। हमें अपने जीवन में ‘सात्विक’ दिनचर्या को अपनाना चाहिए—जिसमें शुद्ध और शाकाहारी भोजन, उत्तम विचार, और पवित्र आचरण शामिल हो। सात्विक जीवन शैली न केवल हमारे शरीर को स्वस्थ रखती है, बल्कि हमारे मन को भी शांत और एकाग्र बनाती है, जिससे हम ईश्वर के और करीब पहुँच पाते हैं।
राष्ट्र सेवा सर्वोपरि
सनातन परंपरा में राष्ट्र को भी एक देवता (राष्ट्र-देवता) माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने हमेशा धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए कार्य किया। संस्थान का यह नियम सिखाता है कि हमारी देशभक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमारे कर्मों में झलकनी चाहिए। एक सच्चा गीता प्रेमी वही है जो अपने देश के कानूनों का पालन करे, राष्ट्र की संपत्ति की रक्षा करे और जब भी समाज या देश को आवश्यकता हो, तो वह सबसे आगे खड़ा मिले। राष्ट्र का हित ही हमारे लिए सर्वोपरि है।
मन और इंद्रिय निग्रह
गीता में मन को वायु के समान चंचल बताया गया है, जिसे केवल अभ्यास और वैराग्य से ही वश में किया जा सकता है। आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार मनुष्य को पतन की ओर ले जा रहे हैं, वहाँ अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना अत्यंत आवश्यक है। संस्थान के सदस्यों को ध्यान, प्रार्थना और निरंतर आत्म-निरीक्षण के माध्यम से अपने मन को संयमित रखने का प्रयास करना चाहिए। जिस व्यक्ति ने अपने मन को जीत लिया, उसने मानो पूरी दुनिया को जीत लिया।
नि:स्वार्थ सेवा भाव
दीन-दुखियों, असहायों और शोषितों की सेवा करना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है। विश्व गीता संस्थान ‘नर सेवा, नारायण सेवा’ के सिद्धांत में विश्वास रखता है। हमारा यह नियम हमें सिखाता है कि हम अपनी क्षमता के अनुसार समाज के पिछड़े वर्ग, बीमार लोगों और जरूरतमंदों की तन, मन और धन से सहायता करें। सेवा का यह कार्य बिना किसी नाम, यश या प्रसिद्धि की लालसा के होना चाहिए। नि:स्वार्थ भाव से किया गया एक छोटा सा कार्य भी परमात्मा के दरबार में बहुत बड़ा माना जाता है।
भावी पीढ़ी में संस्कारों का सिंचन
किसी भी राष्ट्र या धर्म का भविष्य उसकी आने वाली पीढ़ी (बच्चों और युवाओं) पर निर्भर करता है। आज के समय में, जब पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता के प्रभाव में हमारे युवा अपने संस्कारों से दूर हो रहे हैं, तब उन्हें वापस अपनी जड़ों से जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती है। संस्थान का यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि हम अपने बच्चों को बाल्यकाल से ही गीता के श्लोक, रामायण, महाभारत की कथाएं और हमारे महापुरुषों के चरित्र के बारे में बताएं। उन्हें संस्कारवान बनाकर ही हम एक सुरक्षित और महान भारत का निर्माण कर सकते हैं।
विश्व गीता संस्थान - प्रमुख पदाधिकारी

श्री नीलेश शर्मा जी
अन्तरराष्ट्रीय अध्यक्ष

माननीय श्री देवदत्त शर्मा जी
कार्याध्यक्ष -विश्व गीता संस्थान

माननीय कवयित्री तुषा शर्मा
महासचिव – विश्व गीता संस्थान
फोटो गैलरी













विश्व गीता संस्थान
भगवान श्री कृष्ण के दिव्य उपदेशों और श्रीमद्भगवद्गीता के शाश्वत ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए विश्व गीता संस्थान की स्थापना की गई है। गीता के प्रेरक संदेशों को समाज में स्थापित करने के लिए यह एक समर्पित राष्ट्रीय संगठन है।
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